श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 165
 
 
श्लोक  2.3.165 
तद् एव मन्यते भक्तेः
फलं तद्-रसिकैर् जनैः
भगवत्-प्रेम-सम्पत्तौ
सदैवाव्यभिचारतः
 
 
अनुवाद
चूँकि नाम-संकीर्तन सदैव भगवान के प्रति शुद्ध प्रेम के खजाने की ओर ले जाता है, इसलिए भक्ति सेवा के सच्चे पारखी नाम-संकीर्तन को भक्ति का असली फल मानते हैं।
 
Since nama-sankirtan always leads to the treasure of pure love for the Lord, true connoisseurs of devotional service consider nama-sankirtan to be the real fruit of devotion.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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