श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 161
 
 
श्लोक  2.3.161 
विचित्र-रुचि-लोकानां
क्रमात् सर्वेषु नामसु
प्रियता-सम्भवात् तानि
सर्वाणि स्युः प्रियाणि हि
 
 
अनुवाद
चूँकि लोगों की पसंद अलग-अलग होती है, इसलिए भगवान का हर नाम किसी न किसी व्यक्ति को प्रिय होता है। इसलिए भगवान के सभी नाम प्रिय हैं।
 
Since people have different preferences, each name of God is loved by some individual. Therefore, all the names of God are loved.
तात्पर्य
एक संदेहपूर्ण व्यक्ति यह पूछ सकता है कि क्या भगवान के केवल कुछ नाम ही पूजे जाते हैं और अन्य की उपेक्षा की जाती है। परंतु, वस्तुतः, भगवान के प्रत्येक नाम के अपने भक्त हैं। इस श्लोक में शब्द 'हि' इंगित करता है कि यह निश्चित रूप से सत्य है। कुछ वैष्णव भगवद व्यक्तित्व के एक विशेष नाम को पसंद करते हैं, और कुछ दो, तीन या कई नामों की ओर आकर्षित होते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)