श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  2.3.145 
तयाशु तादृशी प्रेम-
सम्पद् उत्पादयिष्यते
यया सुखं ते भविता
वैकुण्ठे कृष्ण-दर्शनम्
 
 
अनुवाद
उस भक्ति सेवा से तुम्हें शीघ्र ही प्रेम के खजाने का एहसास हो जाएगा और तुम वैकुंठ में कृष्ण को आसानी से देख सकोगे।
 
By that devotional service you will soon realize the treasure of love and you will easily see Krishna in Vaikuntha.
तात्पर्य
परमेश्‍वर के प्रति निष्‍कपट प्रेम सबसे श्रेष्‍ठ संपत्ति है। जैसे श्रीमद-भागवतम (३.१५.२५) में ब्रह्मा जी ने वैकुंठ के अपने विज़न का वर्णन करते हुए कहा है:

यच्‍च व्रजन्त्‍यनमीषां ऋषभानुवृत्‍त्‍या

दूरे यमा हि उपरि नः स्‍पृहणीय-शीलाः

भर्तुः मिथः सु-यशसः कथनानुराग-

वैक्‍ल्‍व्‍य-बाष्‍प-कलया पुलकी-कृतंगाः

"वे लोग जिनके शारीरिक लक्षण परमानंद में बदल जाते हैं, जिनकी सांसे फूलने लगती हैं और प्रभु के गुणों का वर्णन सुनते ही पसीना छूटने लगता है, इन्‍हें परमेश्‍वर के राज्य में स्‍थान प्राप्‍त होता है, भले ही वे ध्‍यान या अन्‍य तपस्‍या की परवाह न करें। परमेश्‍वर का राज्य भौतिक ब्रह्मांडों से परे है और मेरी और अन्‍य देवताओं द्वारा इसकी कामना की जाती है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)