श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  2.3.137 
अन्येभ्य इव कर्मभ्यो
भगवद्-भक्ति-कर्मतः
विविक्तः सन् कथं यातु
वैकुण्ठं मुक्तिम् अर्हति
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति भगवान की भक्ति के कार्यों को अन्य कार्यों की तरह त्याग देता है, उसे वैकुण्ठ क्यों जाना चाहिए? उसे तो केवल मोक्ष ही प्राप्त होना चाहिए।
 
Why should a person who renounces the acts of devotion to God like any other act go to Vaikuntha? He should only attain salvation.
तात्पर्य
व्यक्तिवादियों के लिए, जो भक्तिपूर्ण कार्यों को भौतिक मानते हैं, वे भक्ति सेवा से दया की एक बूंद भी नहीं प्राप्त कर पाते हैं। यदि वे वास्तव में नैष्कर्म्य प्राप्त कर लिया है, भौतिक कार्यों के परिणामों के प्रति लगाव से मुक्ति, तो वे मुक्ति पा सकते हैं, लेकिन भक्ति के बिना वे कभी वैकुण्ठ में प्रवेश नहीं कर सकते। वैकुण्ठ प्राप्त करने के लिए भक्ति के आशीर्वाद से अनुकूल होना चाहिए। इस प्रकार भक्ति सेवा की आध्यात्मिक प्रकृति सकारात्मक और नकारात्मक तर्क दोनों ही तरह से सिद्ध होती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)