श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 133
 
 
श्लोक  2.3.133 
निजेन्द्रिय-मनः-काय-
चेष्टा-रूपां न विद्धि ताम्
नित्य-सत्य-घनानन्द-
रूपा सा हि गुणातिगा
 
 
अनुवाद
भक्ति को केवल शरीर, इंद्रियों और मन की क्रिया न समझें। वास्तव में, यह शाश्वत परम सत्य है, जो भौतिक गुणों से परे, परम परमानंद के रूप में प्रकट होता है।
 
Don't think of devotion as merely an activity of the body, senses, and mind. In reality, it is the eternal Absolute Truth, manifested as supreme bliss, transcending material qualities.
तात्पर्य
ग्रंथ-123 में, जहां वैकुण्ठ के दूतों ने गोपा-कुमार को भक्ति-सेवा करने का परामर्श दिया (भक्ति अनुतिष्ठा), इसे गलती से यह समझा जा सकता है कि भक्ति एक धार्मिक अभ्यास है, मानवीय प्रयास से करने योग्य कुछ। इस संभावित गलतफहमी को दूर करने के लिए, वे यहाँ व्याख्या करते हैं कि शुद्ध भक्ति भौतिक इंद्रियों द्वारा कभी भी प्राप्त नहीं की जाती है। भले ही सुनने का काम कानों से, नामोच्चार का कार्य जीभ से, स्मरण का कार्य मन से और प्रार्थना और अन्य कार्य शरीर के अंगों से किए जाते हैं, किंतु ये कार्य भौतिक नहीं हैं; वे आध्यात्मिक कार्य हैं जिन्हें केवल एक भक्त द्वारा ही जाग्रत आध्यात्मिक इंद्रियों से ही किया जा सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)