सर्व-प्रकारिका भक्तिस्
तादृशी च सदान्यतः
न सम्पद्येत निर्विघ्ना
तन्-निष्ठैर् बहुभिः सह
अनुवाद
अन्यत्र कहीं भी, सभी रूपों में, उनकी ऐसी भक्ति, बिना किसी विघ्न के, तथा इतने सारे शरणागत भक्तों की संगति में, सदैव प्राप्त नहीं हो सकती।
Nowhere else, in all forms, can one always attain such devotion to Him, without any hindrance, and in the company of so many surrendered devotees.
तात्पर्य
वैकुण्ठ में भक्ति-सेवा भौतिक प्रवृत्तियों से रहित है; यह विशुद्ध प्रेम से प्रेरित है। क्योंकि वैकुण्ठ में समय और भौतिक सीमाओं से उत्पन्न निराशाओं का अभाव है, वहाँ निवास करने वाले वैष्णव अपनी आध्यात्मिक काया में प्रेम-भक्ति के रस को पूर्ण स्वतंत्रता के साथ आनंद ले सकते हैं जो कहीं और नहीं मिलती। इसलिए, सभी वैष्णवों को श्री वैकुण्ठ-लोक को वह सम्मान देना चाहिए जिसका वह हकदार है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥