श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 130-131
 
 
श्लोक  2.3.130-131 
यद्य् अप्य् एतादृशी भक्तिर्
यत्र यत्रोपपद्यते
तत् तत् स्थानं हि वैकुण्ठस्
तत्र तत्रैव स प्रभुः

तथापि सर्वदा साक्षाद्
अन्यत्र भगवांस् तथा
न दृश्येतेति वैकुण्ठो
’वश्यं भक्तैर् अपेक्ष्यते
 
 
अनुवाद
यद्यपि जहाँ कहीं भी ऐसी भक्ति होती है, वहाँ परमेश्र्वर अवश्य प्रकट होते हैं, और वह स्थान वैकुण्ठ ही है, फिर भी भक्तों को वैकुण्ठ लोक के प्रति विशेष सम्मान रखना चाहिए, क्योंकि अन्यत्र कहीं भी भगवान सदैव प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखते।
 
Although wherever there is such devotion, the Supreme Lord certainly appears, and that place is Vaikuntha, yet devotees should have special respect for the Vaikuntha planet, because the Lord is not always visible anywhere else.
तात्पर्य
एक प्रश्न उठ सकता है: क्योंकि प्रेम-भक्ति ब्रह्म साक्षात्कार के आनंद का उपहास करती है, परम आनंद की सभी प्रकार की मधुरताओं को समाहित करती है, और इसी संसार में उपलब्ध है तो और कहीं जाने की क्या आवश्यकता है? पद्म पुराण में स्वयं प्रभु कहते हैं कि वह वहीं मिल सकते हैं जहाँ उनके भक्त उन्हें याद करते हैं:

नाहं वसामि वैकुंठे

योगिनां हृदये न च

मद्भक्ता यत्र गायंति

तत्र तिष्ठामि नारद

"मैं वैकुण्ठ में या योगियों के हृदय में वास नहीं करता हूँ। मैं इसके बजाय, हे नारद, वहाँ होता हूँ जहाँ मेरे भक्त मेरी महिमा गाते हैं।"

वैकुंठ-दूत बताते हैं कि एक कारण है कि भक्तों के लिए वैकुण्ठ-लोक भौतिक जगत से अधिक वांछनीय है: केवल पारलौकिक दुनिया में, वैकुण्ठ में, सर्वोच्च भगवान हमेशा अपने सभी विविध आकर्षण, सुंदरता, लीलाओं और व्यक्तिगत गुणों के साथ दिखाई देते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)