संसार-सिंधुं अति-दुस्तरं उत्तीर्णों
नान्यः प्लवो भगवत: पुरुषोत्तमस्य
लीला-कथा-रस-निषेवणम अंतरेणा
पुंसो भवेद विविध-दु:ख-दावर्दितस्य
"असंख्य कष्टों की आग में जल रहे व्यक्ति के लिए और जो भौतिक अस्तित्व के इस अजेय महासागर को पार करना चाहता है, उसके लिए भगवान के शगलों के कथा-रस में भक्ति को स्थापित करने के सिवाय कोई उपयुक्त नाव नहीं है।" (भागवतम् 12.4.40)
पिबंति ये भगवत आत्मनः सतां
कथामृतं श्रवण-पुटेषु संभृतम्
पुंनंति ते विषय-विदूषितशयं
व्रजन्ति तत्-चरण-सरोरुहान्तिकम्
"वे लोग जो सुनने के जरिए पीते हैं, उनके कान भक्तों के प्रेमी भगवान कृष्ण के अमृत-जैसे संदेश से भरे होते हैं, वे अपने जीवन के प्रदूषित उद्देश्य को शुद्ध करते हैं जिसे भौतिक सुख के रूप में जाना जाता है और इस तरह भगवान के पास लौटते हैं, भगवान के कमल-जैसे पैरों की तरफ।" (भागवतम् 2.2.37)
