श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 124
 
 
श्लोक  2.3.124 
तज्-ज्ञापकं च भज भागवतादि-शास्त्रं
लीला-कथा भगवतः शृणु तत्र नित्यम्
ता एव कर्ण-विवरं प्रणयात् प्रविष्टाः
सद्यः पदं भगवतः प्रभवन्ति दातुम्
 
 
अनुवाद
भागवत और अन्य शास्त्रों का आदर करो जो इस भक्ति का वर्णन करते हैं। उनसे नियमित रूप से भगवान की लीलाओं का श्रवण करो। क्योंकि जब वे कथाएँ तुम्हारे कानों में प्रवेश करेंगी और तुम प्रेमपूर्वक उनका रसपान करोगे, तो वे तुम्हें शीघ्र ही भगवान का धाम प्रदान करेंगी।
 
Respect the Bhagavatam and other scriptures that describe this devotional path. Regularly listen to the stories of the Lord's pastimes from them. For when those stories enter your ears and you savor them with love, they will quickly lead you to the abode of the Lord.
तात्पर्य
गौपकुमार का नौ तरह की भक्ति से परिचय न होने की वजह से वैकुंठ के संदेशवाहक पहले उन्हें श्रवण के तरीके के बारे में जानकारी देते हैं। श्रवण के सभी अधिकृत रूपों में, समस्त रूपों में, विशेषतः श्रीमद् भागवतम् से भगवान के शगलों को सुनना सबसे प्रभावी होता है। श्रीमद् भागवतम् अक्सर इस अनुसंशा को दोहराता है:

संसार-सिंधुं अति-दुस्तरं उत्तीर्णों

नान्यः प्लवो भगवत: पुरुषोत्तमस्य

लीला-कथा-रस-निषेवणम अंतरेणा

पुंसो भवेद विविध-दु:ख-दावर्दितस्य

"असंख्य कष्टों की आग में जल रहे व्यक्ति के लिए और जो भौतिक अस्तित्व के इस अजेय महासागर को पार करना चाहता है, उसके लिए भगवान के शगलों के कथा-रस में भक्ति को स्थापित करने के सिवाय कोई उपयुक्त नाव नहीं है।" (भागवतम् 12.4.40)

पिबंति ये भगवत आत्मनः सतां

कथामृतं श्रवण-पुटेषु संभृतम्

पुंनंति ते विषय-विदूषितशयं

व्रजन्ति तत्-चरण-सरोरुहान्तिकम्

"वे लोग जो सुनने के जरिए पीते हैं, उनके कान भक्तों के प्रेमी भगवान कृष्ण के अमृत-जैसे संदेश से भरे होते हैं, वे अपने जीवन के प्रदूषित उद्देश्य को शुद्ध करते हैं जिसे भौतिक सुख के रूप में जाना जाता है और इस तरह भगवान के पास लौटते हैं, भगवान के कमल-जैसे पैरों की तरफ।" (भागवतम् 2.2.37)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)