श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 114
 
 
श्लोक  2.3.114 
श्री-गोप-कुमार उवाच
तच्-छङ्कर-प्रसादेन
परानन्द-भरं गतः
किञ्चिद् इच्छन्न् अपि ब्रह्मन्
नाशकं वदितुं ह्रिया
 
 
अनुवाद
श्रीगोपकुमार बोले: हे ब्राह्मण! भगवान शिव की कृपा से मैं परम आनंद से भर गया। मैं कुछ कहना चाहता था, परन्तु लज्जा के कारण कह नहीं पाया।
 
Shri Gopakumara said, "O Brahmin! By the grace of Lord Shiva, I am filled with supreme joy. I wanted to say something, but I was embarrassed and could not.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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