श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 113
 
 
श्लोक  2.3.113 
अत्रापि भगवन्तं यद्
दृष्टवान् असि तादृशम्
सद्-गुरोः कृपया कृष्ण-
दिदृक्षा-भर-कारितम्
 
 
अनुवाद
फिर भी, यहाँ भी तुमने परम प्रभु को इस रूप में देखा है क्योंकि तुम्हारे दिव्य गुरु ने तुम पर कृपा की थी। उस कृपा ने तुम्हारे भीतर कृष्ण के दर्शन की प्रबल इच्छा उत्पन्न की, जिसने कृष्ण को स्वयं प्रकट होने के लिए प्रेरित किया।
 
Yet, even here you have seen the Supreme Lord in this form because your divine guru bestowed grace upon you. That grace aroused within you a strong desire to see Krishna, which prompted Krishna to manifest Himself.
तात्पर्य
महाकाल-पुर में, जहाँ अनेक लोग अवैयक्तिक मुक्ति अनुभव करने आते हैं, वहीं गोप-कुमार को भगवान् महाकाल विष्णु के सौन्दर्य का दर्शन हुआ। यदि गुरु और वैष्णवों की कृपा से व्यक्ति परम पुरुष के दर्शन के लिए उत्सुक हो, तो उसकी सफलता में कोई बाधा नहीं रह सकती।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)