श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 112
 
 
श्लोक  2.3.112 
द्वारका-वासि-विप्रेण
कृष्ण-भक्ति-रसार्थिना
इतो नीताः सुतास् तत्र
स-चातुर्य-विशेषतः
 
 
अनुवाद
द्वारका में रहने वाले ब्राह्मण, जो कृष्ण-भक्ति का रस चखना चाहते थे, बड़ी चतुराई से अपने पुत्रों को यहाँ से द्वारका ले आये।
 
The Brahmins living in Dwaraka, who wanted to taste the essence of Krishna-bhakti, cleverly brought their sons from here to Dwaraka.
तात्पर्य
धर्मग्रंथों के अलावा, सम्माननीय पर्सन्स का व्यवहार भी साबित करता है कि वैष्णवों के लिए सायुज्य-मुक्ति अवांछनीय है। अपने नवजात पुत्रों की असामयिक मृत्यु की शिकायत लेकर कृष्ण के पास आए द्वारका के ब्राह्मण का मकसद वास्तव में अपने पुत्रों को मुक्ति के धाम से वापस लाना था। कृष्ण के प्रकट होने के दौरान द्वारका के निवासियों के पास आध्यात्मिक सच्चिदानंद शरीर थे और श्री देवकी-नंदन के चरणों में अपनी प्रेमपूर्ण सेवा के बल पर वे अवैयक्तिक मुक्ति के सुख की अवहेलना करते थे। कुछ व्यक्ति पुराणिक इतिहास को समझाने के अपने प्रयास में कहते हैं कि द्वारका के निवासी मात्र पांच मूलभूत तत्वों से बने शरीर वाले मानव थे क्योंकि ऐतिहासिक विवरण उनके जन्म और मृत्यु का वर्णन करते हैं। पुराणिक विद्वानों का कहना है कि भौतिक शरीरों में भी द्वारका के निवासी कृष्ण के साथ घनिष्ठ संबंध प्राप्त कर लेते थे क्योंकि उनके प्रति उनके शुद्ध प्रेम में उनकी अनोखी भक्ति थी। हालांकि, इन टीकाकारों को यह स्वीकार करना होगा कि द्वारकावासी केवल सामान्य भौतिक रूप से मूर्त मानवों की तरह कार्य करने का दिखावा करते थे। अगर वास्तव में यही होता तो वे भगवान के विभिन्न आनंदमय शगलों में शामिल होने के अयोग्य होते जिनका शारीरिक रूप शुद्ध सच्चिदानंद है। इसके अलावा, यह एक स्थापित तथ्य है कि भगवद्भक्ति की शक्ति से किसी का शरीर पूरी तरह से आध्यात्मिक हो जाता है और यह सिद्धांत निश्चित रूप से द्वारका के शुद्ध भक्तों पर लागू होना चाहिए। विद्वान कह सकते हैं कि अगर द्वारका के भक्त केवल भौतिक शरीर होने का दिखावा करते थे तो भगवान को मानवीय रूप धारण करना और मानव की तरह व्यवहार करना भी केवल एक दिखावा ही रहा होगा। लेकिन वे कहते हैं कि ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि ब्राह्मण की शिकायत के बाद श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि भगवान के हर व्यक्तिगत रूप हमेशा वास्तविक और सर्वव्यापी होते हैं। अब, जो कुछ विद्वान कहते हैं उसे सतही तौर पर सच माना जाना चाहिए। निश्चित रूप से भगवान के प्रकट होने भौतिक जीवन की झूठी नकल नहीं हैं क्योंकि ये सभी शाश्वत हैं और वह अपने विभिन्न उपासकों को उन्हीं रूपों में हमेशा प्रकट करते हैं। और, फिर, विद्वानों के विचार का समर्थन करते हुए, आधिकारिक धर्मग्रंथों में वर्णित है कि भगवान के धाम जैसे द्वारका के निवासी कभी-कभी अपने नकली मानवीय रूप को त्याग देते हैं और अपने शुद्ध आध्यात्मिक सच्चीदानंद रूपों को ग्रहण कर लेते हैं। श्रीमद्भागवत (10.29.9-11) में बताया गया है कि उदाहरण के लिए, कुछ गोपियाँ जो रास नृत्य में शामिल नहीं हो सकीं, उन्होंने अपने मानवीय शरीर को त्याग दिया और तुरंत अपने सच्चिदानंद शरीर प्राप्त कर लिए:

अन्तर्गृहगताः काश्चित्

गोप्योऽलब्धविनिर्गमाः

कृष्णं तद्भावनायुक्ता

दधुर्मिलितलोचनाः

दुःसहप्रेष्ठविरह-

तीव्रतापधुताशुभाः

ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेष-

निर्वृत्या क्षीणमंगलाः

तम एव परमात्मानं

जारबुद्ध्यापि संगताः

जहुर्गुणमयं देहं

सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः

"कुछ गोपियाँ, अपने घरों से बाहर निकलने में असमर्थ होने के कारण, शुद्ध प्रेम में भगवान कृष्ण पर ध्यान करते हुए आँखें बंद करके घर पर ही रहीं। उन गोपियों के लिए, अपने प्रियतम से असहनीय अलगाव के कारण तीव्र पीड़ा हुई जिसने सभी अधर्मी कर्म को जला दिया। उन पर ध्यान करके उन्होंने उनके आलिंगन को महसूस किया और उनके आनंद ने उनकी भौतिक पवित्रता को समाप्त कर दिया। यद्यपि भगवान कृष्ण सर्वोच्च आत्मा हैं, ये लड़कियाँ बस उन्हें अपने पुरुष प्रेमी के रूप में सोचती थीं और उस घनिष्ठ मनोभाव में उनसे जुड़ती थीं। इस प्रकार उनके कर्मबंधन नष्ट हो गए और उन्होंने अपने पाशविक भौतिक शरीर को त्याग दिया।" अपने मानवीय शरीर को त्याग कर ये गोपियाँ भगवान से उनके मूल रूपों में जुड़ने और उनके साथ आनंदमय शगलों का आनंद लेने में सक्षम हो गईं जिसने उन्हें सबसे अधिक आकर्षित किया। यहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि गोपियों ने अपने आध्यात्मिक शरीर, अनंत, आनंदमय और ज्ञान से भरपूर शरीर प्राप्त कर लिए, भगवान के शरीर की तरह। इस प्रकार से गोपियाँ भगवान से अधिक घनिष्ठ रूप से जुड़ सकीं- संगताः ।

श्रीमद्भागवत (10.47.37) में, वृंदावन में उद्धव द्वारा दिए गए संदेश में, भगवान ने इसी घटना को इसी तरह से बताया:

या मया क्रीडता रात्र्यां

वनेऽस्मिन् व्रज आस्थिताः

अलब्धरासाः कल्याण्यो

मापुर मद्वीर्यचिन्तया

"यद्यपि कुछ गोपियों को गोपाल गांव में रहना पड़ा और जंगल में मेरे साथ रात में खेलने के लिए रास नृत्य में शामिल नहीं हो सकीं, लेकिन फिर भी वे भाग्यशाली थीं, क्योंकि उन्हें मेरे शक्तिशाली शगलों के बारे में सोचकर मुझे प्राप्त किया।" गोपियों द्वारा आध्यात्मिक पहचान प्राप्त करने के समान ही शिशुपाल और दंतवक्र की मुक्ति हुई। जब भगवान नारायण के राज्य के इन पूर्व गेटकीपरों को श्री कृष्ण ने मार डाला, तो शनक और उनके भाइयों द्वारा उन पर दिया गया श्राप समाप्त हो गया, और पूर्व गेटकीपरों की आत्माओं को कृष्ण की तेजस्विता में विलीन होते देखा गया। हालाँकि, यह स्पष्ट विलय वास्तव में सायुज्य-मुक्ति नहीं था, क्योंकि इन दोनों व्यक्तियों के लिए, जो भगवान के भक्त थे, और वैकुंठ के निवासी भी, अवैयक्तिक मुक्ति सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता। भागवत (7.1.47) में, नारद मुनि वर्णन करते हैं कि वास्तव में शिशुपाल और दंतवक्र के साथ क्या हुआ था:

वैरानुबन्धतीव्रेण

ध्यानेनाच्युतसात्मतां

नीतौ पुनर हरेः पार्श्वं

जगमतुर्विष्णुपार्षदौ

"विष्णु भगवान के इन दो सहयोगियों- जय और विजय- ने बहुत लंबे समय तक शत्रुता की भावना बनाए रखी। इस तरह से हमेशा कृष्ण के बारे में सोचने के कारण, उन्होंने भगवान की शरण वापस पा ली, और घर वापस लौट आए, भगवान के पास।" इससे विष्णु भगवान के शब्द पूरे हुए। जब जय और विजय, चार कुमारों द्वारा शापित, वैकुंठ में अपने घर से गिरने वाले थे तब भगवान विष्णु ने उन्हें आश्वासन दिया था कि वे केवल तीन जन्मों के बाद उनके निवास स्थान पर लौट आएंगे। और इसलिए जय और विजय ने अपने भौतिक शरीर को त्याग दिया और भगवान के शाश्वत सेवकों के रूप में, अपने आध्यात्मिक शरीरों में, अपने पदों को फिर से शुरू करने गए।

इस प्रकार श्रील सनातन गोस्वामी ने सैद्धांतिक संभावना के रूप में माना है कि जो भक्त उनके प्रकट होने के दौरान भगवान के निवास में रहते हैं उनके कभी-कभी भौतिक शरीर होते हैं। हालाँकि, उनकी अपनी राय अलग है। हालाँकि, उनकी अपनी राय अलग है। उनका दृढ़ विश्वास है कि जिस तरह भगवान की उपस्थिति, यहां तक ​​​​कि नश्वर दुनिया के भीतर एक इंसान के रूप में, हमेशा विशुद्ध रूप से पारलौकिक होती है, उसी तरह उनके लीलाओं में भाग लेने वाले भक्तों के "मानव" शरीर भी होते हैं। जब वे भक्त प्रकट होते हैं या गायब हो जाते हैं, तो वे या तो अपने प्रिय भगवान की लीलाओं की आवश्यकताओं का जवाब दे रहे होते हैं या अपने पूर्ण रूप से खिले हुए प्रेम के आनंद को व्यक्त कर रहे होते हैं। इस तरह से हमें "अपने शरीर को अलग रखना" जैसे वाक्यांशों को समझना चाहिए, जिनका उपयोग पुराणों में इस दुनिया से भक्तों के गायब होने का वर्णन करने के लिए किया जाता है।

जो गोपियाँ रास नृत्य में शामिल नहीं हो सकीं (भागवत 10.29.9-11) उनके बारे में ऊपर उद्धृत तीन श्लोकों को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है: उन गोपियों ने तुरंत अपने शरीर त्याग दिए, हालाँकि वे शरीर गुण-मय थे, सभी से भरे हुए थे उत्कृष्ट आध्यात्मिक गुण, और इसका मतलब यह है कि एक लीला के रूप में वे गोपियाँ इस दुनिया की दृष्टि से गायब हो गईं। जैसा कि कहा गया है, वे विशेष गोपियाँ विशेष रूप से योग्य थीं, क्योंकि उन्होंने अपने परमपुरुषों की संगति प्राप्त करके, पूर्ण रूप से परमात्मा को प्राप्त कर लिया था। यह, वास्तव में, सभी मामलों में गोपियों की पूर्णता का प्रमुख कारण है।

इसलिए, जब भागवतम (10.29.11) प्रक्षिण-बंधनाः शब्द का उपयोग करता है, तो यह इंगित नहीं करता है कि अपने घरों तक सीमित गोपियों को कर्म से मुक्त कर दिया गया था और भौतिक शरीर से मुक्त कर दिया गया था, बल्कि यह कि उन्होंने भगवान की विशेष दया प्राप्त की, जिससे वेदों के कर्तव्यों तथा निषेधों के बंधन से मुक्ति प्राप्त करना। विचार की इसी पंक्ति में, श्री नारद श्रीमद-भागवतम (4.29.46) के चौथे स्कंध में कहते हैं:

यदा यस्यानुगृहणति

भगवान आत्म-भावितः

सा जहाति मतिम् लोके

वेदे च परिनिष्ठितम्

“जब कोई व्यक्ति पूरी तरह से भक्ति सेवा में लगा होता है, तो भगवान उस पर कृपा करते हैं, जो अपनी अहैतुकी दया प्रदान करते हैं। ऐसे समय में, जागृत भक्त वेदों में वर्णित सभी भौतिक गतिविधियों और कर्मकांडों को त्याग देता है।

रास नृत्य के दौरान अपने घरों में बंद गोपियों के बारे में बात करते हुए, भागवतम कहता है, निवृत्ति कृष्ण-मंगल:, जिसका सबसे स्पष्ट अर्थ है "उनके आनंद से उनके पवित्र कर्म नष्ट हो गए।" लेकिन श्रील सनातन गोस्वामी, शब्दों को अलग-अलग तरीके से विभाजित करते हुए कहते हैं कि उनके ध्यान में कृष्ण के आलिंगन ने उन्हें इतना असाधारण आनंद दिया कि उनकी शुभता, जो उनके तिलक के निशानों का प्रतीक है, कभी फीकी नहीं पड़ी (अक्षिण-मंगलः)। या फिर, श्रील सनातन सुझाव देते हैं, अक्षिण-मंगलः का एक अलग अर्थ लेते हुए, उनके पवित्र श्रेय और भक्ति सेवा के उनके सर्व-शुभ अभ्यास को अटल बनाया गया था। और धुताशुभ: वाक्यांश, जिसका अर्थ है कि उनके अपवित्र कर्म दूर हो गए, का अर्थ यह भी लिया जा सकता है कि ऐसी भाग्यशाली स्थिति में भी अपने प्रिय से अलग होने की असहनीय पीड़ा ने उनके तेज (भा) को जल्दी (आशु) नष्ट कर दिया। या, वैकल्पिक रूप से, वे कृष्ण के वृन्दावन से मथुरा प्रस्थान पर उनसे अलग होने के भविष्य के दुर्भाग्य (अशुभ) से बच गए थे।

इन गोपियों ने कृष्ण को अपना सर्वोपरि मानकर उनका घनिष्ठ सानिध्य अर्जित किया था। शुकदेव गोस्वामी इन छंदों में उस विषय पर अधिक विस्तार से नहीं बताते हैं, क्योंकि यह विषय इतना गोपनीय है कि खुली सभा में चर्चा नहीं की जा सकती। श्रीगीता-गोविंद के विभिन्न छंदों में गोपियों की पारकीया मनोदशा के बारे में विस्तार से बताया गया है, जैसे कि एक शुरुआत निभृत-निकुंज-गृहम गतया (2.11-12)।

शुकदेव गोस्वामी ने उल्लेख किया है कि इन गोपियों ने कृष्ण मिलित-लोचनाः का ध्यान किया - यानी, ध्यान का अभ्यास करने वाले योगियों की तरह उनकी आँखें आधी बंद थीं। अथवा, इसे लाक्षणिक रूप से समझकर उन्होंने श्रुति और स्मृति की दो आँखें बंद कर ली थीं। श्रुति-स्मृति उभे नेत्रे कथन के अनुसार, श्रुति और स्मृति के रूप में वैदिक शास्त्र बद्ध आत्माओं के लिए ज्ञान की आंखें हैं। पूरी तरह से जागरूक गोपियों के लिए शास्त्रीय निर्देशों का कोई उपयोग नहीं रह गया था। इस प्रकार उन्होंने बाहरी हर चीज़ से अपनी आँखें बंद कर लीं और अपना हृदय केवल कृष्ण पर केंद्रित कर दिया। फिर, क्योंकि उन्हें रास नृत्य में शामिल होने के लिए अपने घर छोड़ने की अनुमति नहीं थी, उन्होंने अपने शरीर त्याग दिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)