श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.3.1 
श्री-गोप-कुमार उवाच
ब्रह्म-लोकाद् इमां पृथ्वीम्
आगच्छन् दृष्टवान् अहम्
पूर्वं यत्र यदासीत् तद्-
गन्धो ’प्य् अस्ति न कुत्रचित्
 
 
अनुवाद
श्रीगोपकुमार ने कहा: जब मैं ब्रह्मलोक से इस पृथ्वी पर आया, तो मैंने देखा कि यहाँ कहीं भी पहले जैसी स्थिति का संकेत तक नहीं था।
 
Sri Gopakumara said: When I came to this earth from Brahmaloka, I saw that there was not even a hint of the previous situation anywhere here.
तात्पर्य
इस तीसरे अध्याय में, गोपा-कुमार ब्रह्माण्ड के आठ आवरणों को पार करके मुक्ति, मुक्ति के धाम में प्रवेश करते हैं। वहाँ, भगवान शिव की उपस्थिति में, वैकुण्ठ के भगवान के सेवक उन्हें शुद्ध भक्ति सेवा की विशेषताओं की व्याख्या करते हैं।

गोपा-कुमार पहले मथुरा-मंडल लौटते हैं, जहाँ परम भगवान के शब्दों की सच्चाई उन्हें दिखाई जाती है। भगवान ने घोषणा की थी कि श्री मथुरा कभी भी समय के प्रभाव से परेशान नहीं होता है, और अब गोपा-कुमार इसे खुद देखते हैं। जबकि वह उच्च ग्रहों पर दूर थे, पृथ्वी का बाकी हिस्सा पूरी तरह से बदल गया था, और वहाँ से पहले रहे देवता, मानव और अन्य जीवों का कोई निशान नहीं रह गया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)