श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 2: ज्ञान (ज्ञान)  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  2.2.63 
ततो ’क्षय-वट-च्छाये
क्षेत्रे श्री-पुरुषोत्तमे
आगत्य श्री-जगन्नाथं
पश्येयम् इति रोचते
 
 
अनुवाद
तब मैंने सोचा कि श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्र में अच्युत वट वृक्ष की छाया में भगवान जगन्नाथ के दर्शन करना अधिक अच्छा होगा।
 
Then I thought that it would be better to have darshan of Lord Jagannath under the shade of Achyuta Vat tree in Sripurushottam Kshetra.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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