श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 2: ज्ञान (ज्ञान)  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.2.14 
प्राप्य प्राप्यं द्रष्टुम् इष्टं च दृष्ट्वा
तत्रात्मानं मन्यमानः कृतार्थम्
दूराद् भूयो दण्ड-वद् वन्दमानस्
तेनाहूतो ’नुग्रह-स्निग्ध-वाचा
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मैंने अपने प्रयासों का लक्ष्य प्राप्त कर लिया और वह वस्तु देख ली जिसकी मुझे अभिलाषा थी। अब मुझे अपना जीवन पूर्ण प्रतीत हुआ। मैंने दूर से ही बार-बार साष्टांग प्रणाम किया और प्रार्थनाएँ कीं। तब भगवान विष्णु ने करुणा से भरी मधुर वाणी में मुझे पुकारा।
 
Thus, I had achieved the goal of my efforts and seen what I had longed for. My life now seemed complete. From a distance, I prostrated myself repeatedly and offered prayers. Then Lord Vishnu called out to me in a sweet, compassionate voice.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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