श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  2.1.88 
तस्मिन् गो-भूषिते ’पश्यन्
कम् अपीतस् ततो भ्रमन्
केशी-तीर्थस्य पूर्वस्यां
दिशि शुश्राव रोदनम्
 
 
अनुवाद
वह उस गौ-सुशोभित भूमि में इधर-उधर भटकता रहा, किसी से मिला नहीं। लेकिन केशी-तीर्थ के पूर्व दिशा में एक स्थान पर उसने किसी के रोने की आवाज़ सुनी।
 
He wandered about in that cow-adorned land, encountering no one. But at a spot east of Keshi Tirtha, he heard someone crying.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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