एवं स पूर्व-वन् मन्त्रं
तं जपन् निर्जने निजम्
देवं साक्षाद् इवेक्षेत
सतां सङ्ग-प्रभावतः
अनुवाद
इस प्रकार ब्राह्मण पहले की तरह एकांत में अपना मंत्र जपता रहा। और वैष्णवों की संत-संगति के प्रभाव से उसे अपने प्रभु का साक्षात् दर्शन होने लगा।
Thus, the Brahmin continued chanting his mantra in solitude as before. Under the influence of the Vaishnava saints, he began to have direct visions of his Lord.
तात्पर्य
चूँकि अज्ञानी ब्राह्मण के पास शुद्ध भक्त आध्यात्मिक गुरु के अनुदेश और आशीर्वाद की कमी थी, इसलिए उसने अभी तक ज्ञान और आस्था का विकास नहीं किया था। पर वह प्रयाग में साधु-संग का लाभ ले रहा था। गुरु और शास्त्र के समर्थन के बिना भी, वैष्णवों के साथ अनुकूल संपर्क में रहकर वह कुछ प्रगति कर रहा था। वह दस-अक्षरों वाले गोपाल मंत्र का जाप करता रहा, जिसकी ख्याति सभी मंत्रों में सबसे श्रेष्ठ के रूप में है, और जैसे-जैसे उसका हृदय अधिक से अधिक स्वच्छ होता गया, वह एक गहन ध्यान में प्रवेश कर गया, जिसमें उसने अपने प्रभु को उतनी ही स्पष्टता से देखा जैसे प्रभु शारीरिक रूप से मौजूद थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥