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श्लोक 2.1.79  |
एवं स पूर्व-वन् मन्त्रं
तं जपन् निर्जने निजम्
देवं साक्षाद् इवेक्षेत
सतां सङ्ग-प्रभावतः |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार ब्राह्मण पहले की तरह एकांत में अपना मंत्र जपता रहा। और वैष्णवों की संत-संगति के प्रभाव से उसे अपने प्रभु का साक्षात् दर्शन होने लगा। |
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| Thus, the Brahmin continued chanting his mantra in solitude as before. Under the influence of the Vaishnava saints, he began to have direct visions of his Lord. |
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