श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  2.1.64 
श्री-परीक्षिद् उवाच
ततो ’सौ लज्जितो विप्रो
’पृच्छत् स-प्रश्रयं मुदा
कुतो वसति कीदृक् स
किं वार्थं दातुम् ईश्वरः
 
 
अनुवाद
श्री परीक्षित बोले: यह सुनकर ब्राह्मण लज्जित हो गया। बड़ी विनम्रता और प्रसन्नता के साथ उसने उनसे पूछा, "ये भगवान कहाँ रहते हैं? वे कैसे हैं? वे क्या-क्या लाभ पहुँचाने में समर्थ हैं?"
 
Sri Parikshit said: Hearing this, the Brahmin was ashamed. With great humility and joy, he asked him, "Where does this Lord live? What is He like? What benefits is He capable of bestowing?"
तात्पर्य
इस भगवान् को भक्त विष्णु कहते थे। ब्राह्मण को पता नहीं था कि यह कौन हैं। ब्राह्मण उसे बहुत उत्सुकता थी कि यह भगवान गांव में रहते हैं, नगर में रहते हैं या अन्यत्र? इनका रूप किनके समान है- देवता के समान है, मनुष्य के समान है या किसी तिर्यंच का है? इनके विभूतियाँ क्या हैं और वह भक्तों को कौन-कौन सी सिद्धियाँ दे सकते हैं?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)