श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 58-59
 
 
श्लोक  2.1.58-59 
भो वादका नर्तका रे
राम-कृष्णेति-वादिनः
रोदका रम्य-तिलकाश्
चारु-माला-धरा नराः

भवतैकं क्षणं स्वस्था
न कोलाहलम् अर्हथ
वदतेदं विधद्ध्वे किं
कं वार्चयथ सादरम्
 
 
अनुवाद
"मेरे प्यारे संगीतकारों, प्यारे गायकों और नर्तकों, ज़ोर-ज़ोर से 'राम कृष्ण' का नारा लगाते हुए, सुंदर तिलक और आकर्षक मालाओं से सुसज्जित तुम लोग, कृपया एक क्षण के लिए शांत हो जाओ और यह शोरगुल बंद करो! यह कौन सा समारोह मना रहे हो? तुम इतनी श्रद्धा से किसकी पूजा कर रहे हो?"
 
"My dear musicians, lovely singers and dancers, all of you loudly chanting 'Rama Krishna', adorned with beautiful tilaks and attractive garlands, please quiet down for a moment and stop this noise! ​​What festival are you celebrating? Whom are you worshipping with such devotion?"
तात्पर्य
उसने वैष्णवों में से कुछ को साधारण संगीतकार, नर्तक और सांसारिक नारे बोलने वाले के रूप में भ्रम में डाल दिया, लेकिन कम से कम उसने उनके विष्णु-तिलक की सुंदरता की प्रशंसा की, जो कि रूप में विष्णु के मंदिर जैसा था। चूँकि उसे सार्वजनिक मंडली में ऊँची आवाज़ में गाए गए परम भगवान के नामों की पारलौकिक कीमत की जानकारी नहीं थी, इसलिए उसने संकीर्तन को एक व्यर्थ शोर समझा। उसने यह मान लिया था कि इन लोगों के पास करने के लिए सार्थक काम थे और आश्चर्यचकित था कि वे अपने दायित्वों की उपेक्षा करके मूर्खतापूर्ण कार्य क्यों कर रहे थे। या, जैसा उसने अपने प्रश्नों में सुझाया, उसने सोचा कि यह किसी प्रकार का अजीब अनुष्ठान हो सकता है या किसी देवता की असामान्य पूजा भी हो सकती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)