vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री बृहत् भागवतामृत
»
खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य
»
अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)
»
श्लोक 54
श्लोक
2.1.54
सोत्कण्ठो मथुरां गन्तुं
मुहुस् तां कीर्तयंस् ततः
स तद्-देश-दिशं गच्छन्
प्रयागं प्राप वर्त्मनि
अनुवाद
मथुरा जाने की इच्छा से ब्राह्मण उस जनपद की ओर चल पड़ा और उसकी महिमा का गुणगान करता रहा। रास्ते में वह प्रयाग पहुँचा।
Wishing to go to Mathura, the Brahmin set off towards that district, singing its praises. On the way, he reached Prayag.
तात्पर्य
ब्राह्मण पश्चिम की ओर बार-बार ''मथुरा ! मथुरा !'' जपता हुआ निकल पड़ा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×