श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  2.1.52 
इति-कर्तव्यता-मूढो
दीनः सन् स्वप्नम् आगतः
तया देव्या सहागत्य
तत्रादिष्टः शिवेन सः
 
 
अनुवाद
वह असमंजस में पड़ गया कि उसे क्या करना चाहिए, और वह उदास हो गया। तभी एक और स्वप्न में, भगवान शिव, देवी के साथ, उसे निर्देश देने आए।
 
He was confused about what he should do and became depressed. Then in another dream, Lord Shiva, accompanied by the Goddess, came to him to give him instructions.
तात्पर्य
उसका दिल भगवान गोपाल की ओर आकर्षित हो रहा था, लेकिन उसका मन दुविधा में था: "क्या मुझे संन्यास लेकर मुक्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए, या केवल अपने मंत्र का जाप करना चाहिए?" अनात्मवादियों के साथ संगति का संभावित परिणाम यही है: किसी का निश्चय डगमगा जाता है, और वह सही काम नहीं चुन पाता। ब्राह्मण के सपनों में तीसरी बार प्रकट होकर, देवी कामाख्या अपने पति, काशी के स्वामी को साथ लेकर आईं, ताकि उनकी प्रस्तुति अधिक आश्वस्त करने वाली हो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)