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श्लोक 2.1.35  |
विप्रो निष्किञ्चनः कश्चित्
पुरा प्राग्ज्योतिषे पुरे
वसन्न् अज्ञात-शास्त्रार्थो
बहु-द्रविण-काम्यया |
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| अनुवाद |
| बहुत समय पहले प्राग्ज्योतिष नगरी में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। वह शास्त्रों से अनभिज्ञ था और धन-संपत्ति का लोभी था। |
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| Long ago, in the town of Pragjyotish, there lived a poor Brahmin. He was ignorant of the scriptures and greedy for wealth. |
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