क्षतजोक्षं गदा-पाणिं
तपस: सर्वतो दिशं
परिभ्रमन्तम उल्काभां
भ्रमयन्तं गदां मुहुः
"चार लम्बे, सुंदर हाथ, तेजस्वी सोने के कुंडल, गुस्से से रक्त-लाल आँखें, और अपनी गदा को लगातार एक तारे की तरह घुमाते हुए, भगवान बच्चे के चारों ओर घूमे।" (भागवत 1.12.9)
द्रौण्य-अस्त्र-विप्लुष्टं इदं मद्-अंगं
सन्तान-बीजं कुरु-पाण्डवानां
जुगोप कुक्षिं गत आत्त-चक्रो
मातु: च मे य: शरणं गताया:
"क्योंकि मेरी माँ ने भगवान श्री कृष्ण के चरण-कमलों में समर्पण किया, भगवान ने सुदर्शन चक्र को हाथ में लेकर उनके गर्भ में प्रवेश किया और मेरे शरीर को बचाया, जो कौरवों और पाण्डवों के अंतिम शेष वंशज का शरीर था, जो कि अश्वथामा के तेजस्वी हथियार द्वारा लगभग नष्ट हो गया था।" (भागवत 10.1.6)
भगवान के सुंदर स्वरुप को अपनी माँ के गर्भ में देखने से अजन्मे परीक्षित काफी प्रभावित हुए:
अंगुष्ठ-मात्रम् अमलं
स्फुरत्-पुरट-मौलिनाम
आपीव्य-दर्शनं श्यामं
तड़िद् वाससम अच्युतम
श्रीमद्-दीर्घ-चतुर्-बाहुं
तप्त-काञ्चन-कुण्डलम
"भगवान अंगूठे के बराबर थे, परंतु वे पूर्ण रूप से दिव्य थे। उनका एक सुंदर, काला, अचूक शरीर था, और उन्होंने बिजली के रंग के पीले कपड़े पहने थे और जलते हुए सोने का मुकुट पहना था। भगवान चार हाथों और पिघले हुए सोने के कुंडलों से समृद्ध थे। इस प्रकार बच्चे ने उन्हें देखा।" (भागवत 1.12.8-9)
अपने पूरे बचपन में, परीक्षित ने उस भगवान को खोजने की कोशिश की जिसे उन्होंने गर्भ में देखा था। जब भी वे एक समान दिखने वाले व्यक्ति को देखते थे, तो वे खुद से पूछते थे, "क्या ये वही हैं?" श्रीमद-भागवत (1.12.30) उनके नाम की उत्पत्ति का वर्णन करता है:
स एष लोके विख्यात:
परीक्षित इति यत् प्रभु:
पूर्वं दृष्टम अनुध्यायन
परीक्षेत नरेष्व इह
"वे दुनिया में परीक्षित [परीक्षक] के रूप में प्रसिद्ध होंगे क्योंकि वह उस व्यक्तित्व को खोजने के लिए सभी मनुष्यों की जांच करने आएंगे जिन्हें उन्होंने अपने जन्म से पहले देखा था। इस प्रकार वे लगातार प्रभु का चिंतन करने आएंगे।" इस तरह, बचपन में भी परीक्षित हमेशा श्री कृष्ण के सर्व-आकर्षक स्वरुप पर ध्यान करते थे।
