श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 213
 
 
श्लोक  2.1.213 
गन्तुं वृन्दावनं प्रातर्
आज्ञार्थं पुरतः प्रभोः
गतः श्रीमन्-मुखं पश्यन्
सर्वं तद् विस्मराम्य् अहो
 
 
अनुवाद
प्रातःकाल मैं भगवान जगन्नाथ के समक्ष वृन्दावन जाने की अनुमति मांगने गया; किन्तु जब मैंने उनका सुन्दर मुख देखा तो मैं अपनी सारी योजनाएँ भूल गया।
 
In the morning I went to Lord Jagannatha to ask permission to go to Vrindavan; but when I saw his beautiful face I forgot all my plans.
तात्पर्य
गोपा-कुमार ने इस तरह तर्क दिया: "इस ब्रह्मांड का स्वामी, जिसके लिए मैंने व्रज-भूमि को छोड़ा था, मैं उसे यहाँ सीधे प्राप्त कर चुका हूँ। इसे छोड़ना मेरे लिए कैसे सही हो सकता है और मैं ऐसा करने की शक्ति कहाँ से पा सकता हूँ? और भले ही वही भगवान मुझे कुछ विशेष दया दिखाने के लिए अपने पसंदीदा खेल-मैदान, वृंदावन वापस ले जाना चाहें, तब भी मैं पहले उनकी स्पष्ट अनुमति प्राप्त किए बिना यहाँ से दूर नहीं जा सकता।" लेकिन जब गोपा-कुमार मंदिर में भगवान जगन्नाथ के सामने गए, जैसे ही उन्होंने भगवान के दिव्य चेहरे को देखा, वे सब कुछ भूल गए - अपना मानसिक दर्द, वृंदावन की यादें जिसके कारण दर्द हुआ, और प्रभु की अनुमति मांगने का इरादा। यह क्रम दिन-ब-दिन घटित होता रहा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)