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श्लोक 2.1.213  |
गन्तुं वृन्दावनं प्रातर्
आज्ञार्थं पुरतः प्रभोः
गतः श्रीमन्-मुखं पश्यन्
सर्वं तद् विस्मराम्य् अहो |
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| अनुवाद |
| प्रातःकाल मैं भगवान जगन्नाथ के समक्ष वृन्दावन जाने की अनुमति मांगने गया; किन्तु जब मैंने उनका सुन्दर मुख देखा तो मैं अपनी सारी योजनाएँ भूल गया। |
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| In the morning I went to Lord Jagannatha to ask permission to go to Vrindavan; but when I saw his beautiful face I forgot all my plans. |
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