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श्लोक 2.1.20  |
परां काष्ठां गतं तत्-तद्-
रस-जातीयतोचितम्
अथापि रास-कृत्-तादृग्-
भक्तानाम् अस्तु का गतिः |
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| अनुवाद |
| वे सभी भगवान के साथ अपने-अपने आनंदमय आदान-प्रदान में, सुख की चरम सीमा को प्राप्त कर चुके हैं। लेकिन रास नृत्य करने वाले के अनन्य भक्तों के लिए क्या स्थान नियत है? |
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| They have all attained the pinnacle of bliss in their respective blissful exchanges with the Lord. But what place is destined for the exclusive devotees of the Raas dancer? |
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