इसके उत्तर में भगवान जगन्नाथ ने उन्हें आदेश दिया, "मेरा एक भक्त श्री गोवर्धन में जन्मा एक युवा ग्वाला यहाँ आया है। आपको उसका राजतिलक करना चाहिए।" या फिर उन्होंने कहा, "जिसे तुम महाराजा के लक्षण होंगे, उसका राजतिलक करो।" इस प्रकार सर्वोच्च प्रभु, दीनों के दयालु मित्र, सभी व्यवस्थाओं के सबसे चतुर निर्माता, ने मंत्रियों को ऐसे व्यक्ति की तलाश करने का आदेश दिया, जिसमें राजसी लक्षण हों, ऐसे लक्षण जो निश्चित रूप से उन्हें गोपा-कुमार में मिले। इस प्रकार न तो राजकुमारों और न ही अन्य लोगों को उससे ईर्ष्या करने का अवसर मिला।
शाकुंतल की पुत्र, सम्राट भरत के सन्दर्भ में राजसी गुणों के कुछ चिन्हों का उल्लेख श्रीमद-भागवतम (9.20.24) में किया गया है। चक्रं दक्षिण-हस्ते ऽस्य / पद्म-कोशो ऽस्य पादयोः: "उनके दाहिने हाथ की हथेली पर भगवान कृष्ण के चक्र का निशान था और उनके पैरों के तलवों पर कमल की माला का निशान था।"
