श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 198
 
 
श्लोक  2.1.198 
तत्राभिषिक्तः पृष्टस्या-
नुज्ञया जगद्-ईशितुः
सम्परीक्ष्य महा-राज-
चिह्नानि सचिवैर् अहम्
 
 
अनुवाद
मन्त्रियों ने ब्रह्माण्ड के स्वामी से परामर्श किया और उनकी आज्ञा लेकर मुझमें महाराजा के लक्षण देखकर मुझे राजा अभिषिक्त किया।
 
The ministers consulted the Lord of the Universe and after taking his permission, seeing the qualities of a Maharaja in me, anointed me as king.
तात्पर्य
भगवान जगन्नाथ के सन्मुख मंत्रियों ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, "सबसे बड़े राजकुमार आपका कमल मुख देखने में इतने आसक्त हैं कि राज्य शासन में उनका कोई रुचि नहीं है। और सिद्धान्ततः, सबसे बड़े राजकुमार के जीवित रहते कोई भी छोटा राजकुमार सिंहासन पर नहीं बैठ सकता। राजा के परिवार का कोई भी अन्य सदस्य महान शासक के गुणों को नहीं दर्शाता है। परंतु यदि कोई राजा नहीं होगा, तो देश में कम से कम कुछ समय के लिए भी कानून और व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती। कृपा कर हमें बताएं कि हम किसे सिंहासन पर बैठाएं।"

इसके उत्तर में भगवान जगन्नाथ ने उन्हें आदेश दिया, "मेरा एक भक्त श्री गोवर्धन में जन्मा एक युवा ग्वाला यहाँ आया है। आपको उसका राजतिलक करना चाहिए।" या फिर उन्होंने कहा, "जिसे तुम महाराजा के लक्षण होंगे, उसका राजतिलक करो।" इस प्रकार सर्वोच्च प्रभु, दीनों के दयालु मित्र, सभी व्यवस्थाओं के सबसे चतुर निर्माता, ने मंत्रियों को ऐसे व्यक्ति की तलाश करने का आदेश दिया, जिसमें राजसी लक्षण हों, ऐसे लक्षण जो निश्चित रूप से उन्हें गोपा-कुमार में मिले। इस प्रकार न तो राजकुमारों और न ही अन्य लोगों को उससे ईर्ष्या करने का अवसर मिला।

शाकुंतल की पुत्र, सम्राट भरत के सन्दर्भ में राजसी गुणों के कुछ चिन्हों का उल्लेख श्रीमद-भागवतम (9.20.24) में किया गया है। चक्रं दक्षिण-हस्ते ऽस्य / पद्म-कोशो ऽस्य पादयोः: "उनके दाहिने हाथ की हथेली पर भगवान कृष्ण के चक्र का निशान था और उनके पैरों के तलवों पर कमल की माला का निशान था।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)