श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 188
 
 
श्लोक  2.1.188 
दण्ड-वत् प्रणमन्तं मां
दृष्ट्वाशीर्-वाद-पूर्वकम्
आश्लिष्याज्ञापयाम् आस
सर्व-ज्ञो ’नुग्रहाद् इदम्
 
 
अनुवाद
मुझे ज़मीन पर लाठी की तरह दण्डवत् करते देख, मेरे सर्वज्ञ गुरु ने मुझे आशीर्वाद दिया। फिर उन्होंने मुझे गले लगाया और दयापूर्वक मुझसे कहा:
 
Seeing me prostrating on the ground like a stick, my omniscient Guru blessed me. Then he embraced me and said to me with compassion:
तात्पर्य
यदि गोपा-कुमार के गुरु हर चीज़ को जानते थे, तो निश्चित ही बिना बताए उन्हें पता था कि गोपा-कुमार के हृदय में कौन-सी इच्छाएँ निहित हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)