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श्लोक 2.1.178  |
श्री-जगन्नाथ-देवस्य
सेवकेषु कृपोत्तमा
विविधाज्ञा च सर्वत्र
श्रूयते ’प्य् अनुभूयते |
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| अनुवाद |
| सर्वत्र मैंने भगवान श्री जगन्नाथ की अपने सेवकों पर की गई परम कृपा के विषय में सुना और स्वयं देखा तथा उनके द्वारा दिए गए विभिन्न आदेशों को भी समझा। |
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| Everywhere I heard and saw for myself about the supreme grace bestowed by Lord Sri Jagannatha on His devotees and also understood the various orders given by Him. |
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