श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 155
 
 
श्लोक  2.1.155 
कदापि पर-राष्ट्राद् भीः
कदाचिच् चक्रवर्तिनः
विविधादेश-सन्दोह-
पालनेनास्वतन्त्रता
 
 
अनुवाद
कभी मुझे पड़ोसी राज्यों का डर लगता था, तो कभी सम्राट का। उनके विविध और प्रचुर आदेशों का पालन करने से मेरी स्वतंत्रता का गला घोंट दिया जाता था।
 
Sometimes I feared the neighboring kingdoms, sometimes the Emperor. Obeying their varied and numerous orders stifled my freedom.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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