श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 147
 
 
श्लोक  2.1.147 
सम्प्राप्तो जन्म-साफल्यं
न गमिष्याम्य् अतः क्वचित्
वैष्णवानां च कृपया
तत्रैव न्यवसं सुखम्
 
 
अनुवाद
"अब मेरा जीवन सफल हो गया। मैं इस स्थान से कभी नहीं जाऊँगा।" और इस प्रकार, वैष्णवों की कृपा से, मैं वहाँ सुखपूर्वक रहने लगा।
 
"Now my life is successful. I will never leave this place." And thus, by the grace of the Vaishnavas, I lived there happily.
तात्पर्य
गोपा-कुमार अपने परिवार व मित्रों को अपने उपास्य प्रभु की खोज में भटकने के लिए छोड़कर आए थे और अब उन्होंने उन्हें पा लिया था। यद्यपि, एक विदेशी देश के निर्धन भिखारी के रूप में गोपा-कुमार शायद ही यह उम्मीद कर सकते थे कि उन्हें शाही महल के आसपास रहने और राजा के देवता के अवशेषों पर भोजन करने की अनुमति दी जाएगी, लेकिन स्थानीय वैष्णव उनके प्रति दयालु थे। वे उनके लिए महाप्रसाद लाते थे और उन्हें प्रोत्साहित करने और उनकी सुरक्षा करने के लिए हर संभव प्रयास करते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)