श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  2.1.127 
तद्-वाक्यं चानुसन्धाय
जगद्-ईश्वर-साधकम्
तं मन्त्रं मन्यमानो ’हं
तुष्यन् जप-परो ’भवम्
 
 
अनुवाद
अपने गुरु के वचनों पर मनन करते हुए, मैंने मंत्र को जगत के स्वामी को प्राप्त करने का साधन समझा। इस प्रकार मैं संतुष्ट हो गया और जप में लीन हो गया।
 
Reflecting on my guru's words, I understood mantra as a means to attain the Lord of the Universe. Thus, I was satisfied and immersed myself in chanting.
तात्पर्य
गोप कुमार के गुरु ने उन्हें बताया था, "परमेश्वर की दया स्वीकार करें।" इसे याद करते हुए, गोप कुमार ने निष्कर्ष निकाला कि मंत्र भगवान का पक्ष प्राप्त करने के लिए बनाया गया था। जप करने के लिए उत्साहपूर्वक लेने का यह एक संतोषजनक कारण था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)