श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 124
 
 
श्लोक  2.1.124 
मया तु किम् इदं लब्धं
किम् अस्य फलम् एव वा
मन्त्रः कथं साधनीय
इति ज्ञातं न किञ्चन
 
 
अनुवाद
मुझे इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था कि मुझे जो मंत्र मिला था वह क्या था, इसके जाप से क्या फल मिलेगा, या यहाँ तक कि इस मंत्र का अभ्यास कैसे किया जाना चाहिए।
 
I had no idea what the mantra I had received was, what benefits chanting it would bring, or even how to practice it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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