"वे धीया योग-विपाक-तीव्रया हृत्-पद्म-कोषे स्फुरितं तड़ित-प्रभम तिरोहितं सहसैवोपलक्ष्य वहिः-स्थितं तद-अवस्थं ददर्श।"
"ध्रुव महाराज परिपक्व योग की प्रक्रिया में लीन थे, उस प्रभु की स्वरुप जो विद्युत की तरह चमकीला और जिस पर वे पूर्ण रूप से केंद्रित थे, तुरंत गायब हो गये। इस प्रकार ध्रुव विचलित हो गए, और उनका ध्यान भंग हो गया। लेकिन जैसे ही उन्होंने अपनी आंखें खोलीं उन्होंने सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान को स्वयं वर्तमान देखा, जैसे वह अपने हृदय में प्रभु को देखते थे।"
व्रजवासियों द्वारा कृष्ण के सौंदर्य के पूर्ण दर्शन आध्यात्मिक सिद्धि का परम फल है। इसलिए कोई सुझाव दे सकता है कि यदि कृष्ण व्रजवासियों के समक्ष पुनः प्रकट होते हैं तो निश्चित रूप से उनकी स्थिति में सुधार होगा। यह सत्य हो सकता है, लेकिन अलगाव के तीव्र पीड़ा से उबरने में समय लगेगा। और व्रजवासी, यह सोचकर कि कृष्ण उन्हें फिर से छोड़ सकते हैं, अपनी वियोग की तन्मयता में वापस आ सकते हैं। इसलिए कृष्ण सोचते हैं कि उनके पास लौटने से उन्हें केवल दुख में ही अधिक गहराई तक डाला जाएगा।
कृष्ण से अलग होने की पीड़ादायक चिंता व्रज-वासियों के आत्मा - अर्थात उनके हृदय, उनके शरीर और उनके अस्तित्व का सार - को उथल-पुथल में डालती है। जब किसी व्यक्ति ने लंबे समय तक भोजन नहीं किया है, तो उसके शरीर के महत्वपूर्ण तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिससे भोजन प्राप्त करने के बाद भी उसे ठीक होने में समय लगता है। भोजन को अपने सामने रखने से वह ठीक नहीं हो जाता है। उसे खाना होगा, और इस तरह से जो उसे और अधिक बीमार न करे। फिर उसे अपने शरीर में पोषण के वितरित होने की प्रतीक्षा करनी होगी। कृष्ण सोचते हैं, "इसी तरह, व्रजवासी मुझे देखकर ही ठीक नहीं होंगे। उन्हें मेरे साथ मनोरंजन का आनंद उठाना होगा, और केवल थोड़े समय के लिए नहीं बल्कि उनकी इच्छाओं को पूरा करने के लिए जितना आवश्यक हो। मुझे डर है कि यह असंभव साबित होगा, क्योंकि मेरे पास अन्यत्र देखभाल के लिए बहुत सी अन्य चीजें हैं। मैं उन्हें ठीक करने में असमर्थ हूं।"
यहां तक कि अगर कृष्ण की चिंता निराधार हो, अगर वह उनके पास लौटकर अलगाव की बीमारी का इलाज करते हैं, तो भी वे उत्तेजना के प्रति संवेदनशील रहेंगे, यह सोचकर कि वह उन्हें फिर से छोड़ सकते हैं। उनकी चिंता, उनके अस्तित्व का एक अनिवार्य हिस्सा होने के नाते, उनके व्यक्तिगत दर्शन से भी ठीक नहीं की जा सकती। जैसा कि कृष्ण शब्द वाई से संकेत करते हैं, वह अपने स्वयं के वृंदावन के भक्तों के साथ होने वाले अनुभव से यह जानते हैं, और साथ ही वह भक्त भी जिनसे वह द्वारका में बात कर रहे हैं। जैसे कि सुकदेव गोस्वामी ने श्रीमद्-भागवत में दसवें कांड के अंतिम अध्याय में बताया है (10.90.15), कृष्ण की रानियों ने कृष्ण के साथ जल क्रीड़ा का आनंद लिया, उसके बाद रानियां शोक करने लगीं:
"कुरारी विलापसि त्वं वीत-निद्रा न शेषे, स्वपिति जगत रात्र्यां ईश्वरो गुप्त-बोधः। वयं ईव सखी कच्चिद् गाढ-निर्भिन्नचेटा नलिन-नयन-हासोदारा-लीलेक्षितेन।"
"हे कुरारी पक्षी, तुम रात्रि में विलाप कर रहे हो। इस दुनिया में कहीं सर्वोच्च प्रभु एक छिपी हुई जगह में सो रहे हैं। लेकिन हे सखी, तुम पूरी तरह से जाग रही हो, सो नहीं पा रही हो। क्या तुमने, हमारी तरह, नलिन-नयन प्रभु की उदार, चंचल मुस्कुराती झलक से अपने हृदय को गहराई से छलनी पाया है?"
इस श्लोक को बोलते समय, कृष्ण की रानियाँ वास्तव में उससे अलग नहीं थीं। इस प्रकार वे रात्र्यां ईश्वरः कहते हैं, वर्तमान क्षण से रात को भिन्न बताते हुए। वास्तव में वे दिन के दौरान बोल रही थीं, और अभी-अभी पानी में कृष्ण के साथ खेलना समाप्त किया था। इन क्रीड़ाओं का परिचय कराते हुए, सुकदेव ने कहा था:
"उचुः मुकुंदैक-धीयो गिर उन्मत्त-वज जाडम चिन्तयंत्योऽरविंदाक्षं तानि मे गदतः शृणु।"
"फिर रानियाँ मंत्रमुग्ध ट्रान्स में स्तब्ध हो गईं, उनका मन केवल कृष्ण में ही लीन था। उनके कमल नेत्रो-प्रभु के बारे में सोचकर, वे इस तरह बोलीं जैसे वो पागल हों। कृपया मेरे द्वारा बताए गए उनके शब्दों को सुनें।" (भागवत 10.90.14) इस प्रकार रानियाँ, जिनका ध्यान का एकमात्र उद्देश्य कृष्ण था, ट्रान्स में क्षण भर के लिए अवाक थीं। जब कृष्ण के विचारों ने उन्हें बोलने के लिए प्रेरित किया, तो उन्होंने धीरे-धीरे बात की, जैसे मानसिक असंतुलन से उबर रही हों। उनके शब्दों से यह स्पष्ट है कि कृष्ण की रानियाँ उनके साथ आनंद लेने के दौरान भी अलगाव के दर्द की आशंका कर रही थीं। सुकदेव गोस्वामी ने दसवें कांड के अपने कथन को विशेष रूप से गहन मिठास (मधुरेण समाप्येत) के इस स्वर पर समाप्त करने के लिए चुना।
कृष्ण सर्वज्ञ सर्वोच्च प्रभु हो सकते हैं और अपने भक्तों को संतुष्ट करने के लिए सभी चीजों की सबसे कुशल व्यवस्था करने वाले हो सकते हैं, लेकिन इन बहुत ही विशेष भक्तों, व्रज में भक्तों की मदद करने में वे असमर्थ महसूस करते हैं। तेसम ("उनका") फिर से या तो सामान्य रूप से व्रज-वासियों को संदर्भित कर सकते हैं या फिर केवल गोपियों को। इस श्लोक में व्यक्त उनकी भावनाएं किसी भी मामले में सट्टेबाजी कर रही हैं।
व्रजवासियों को खुश करने का कोई भी प्रयास सब कुछ गलत कर देगा, जैसे तेल की आग पर पानी डालने से आग फट जाती है और नियंत्रण से बाहर हो जाती है। इस प्रकार कृष्ण एक दुविधा का सामना करते हैं। एक ओर, व्रजवासी नहीं जानते कि वे कृष्ण से अलगाव में कैसे जीवित रह सकते हैं, और दूसरी ओर भले ही वह लंबे समय तक उनके साथ रहें पर उन्हें अनिवार्य रूप से चिंता होगी कि किसी भी क्षण वह उन्हें फिर से छोड़ सकते हैं। जैसे-जैसे विरहा-भाव की यह सबसे उत्तम पीड़ा उनके हृदय में बढ़ती है, यह उनके दुःख को और भी बदतर कर देगी। कृष्ण का तर्क है कि जैसे सृष्टि के समय अग्नि तत्व को प्रदान की गई गर्मी की प्राकृतिक गुणवत्ता को हटाने का कोई तरीका नहीं है, वैसे ही कोई रास्ता नहीं है कि कोई भी, यहां तक कि वह स्वयं भी, व्रज-वासियों की परमानंद प्रकृति को वापस ले सके। , उनकी अद्वितीय दया द्वारा उन्हें प्रदान किया गया।
यह स्थिति व्रजवासियों का सबसे बड़ा गौरव है। निःसंदेह, व्रज में कृष्ण के भक्त विशेष आनंद महसूस करते हैं जब वे सीधे उनके साथ सहज लीलाओं में शामिल होते हैं जो अन्यत्र कहीं नहीं मिलती। फिर भी, उनसे वियोग से उत्पन्न विशेष शुद्ध प्रेम अधिकांश समय उनके भीतर उमड़ता रहता है। व्रज-वासी अतिउत्कृष्ट विरह-भाव के विशेष प्राप्तकर्ता हैं, जो उनकी सबसे बड़ी दया (परम-महत्त्व) है क्योंकि यह उच्चतम विशेष खुशी से भरा है, जो अपने चरम चरम तक ले जाया जाता है। यद्यपि इस संसार में हर कोई कृष्ण से अलगाव में रहता है, केवल व्रज-वासी ही पूरी तरह से विरह-भाव का अनुभव करते हैं। कृष्ण से अलग होने का उनका विशेष आनंद केवल उनकी विशेष दया से, और उनके साथ बहुत घनिष्ठ संबंध के बाद ही प्राप्त होता है।
कृष्ण अपनी गोपियों और वृन्दावन में अपने अन्य प्रिय भक्तों के दिव्य प्रेम के लिए बहुत आभारी महसूस करते हैं, इसलिए वे उनके विरह-भाव के विनाशकारी प्रभावों को देखना सहन नहीं कर सकते। इसलिए वह दोबारा वृन्दावन में रहने के लिए नहीं लौट सकता, या एक छोटी यात्रा भी नहीं कर सकता।
