रानियों के दृष्टिकोण से, केवल व्रज की गोपियाँ ही सबसे शुद्ध प्रकार के प्रेम की अधिकारी हैं। तदनुसार, कृष्ण उस अद्वितीय प्रेम का अद्वितीय तरीकों से जवाब देते हैं। कभी-कभी वे खुद को एक गोपी के घर के एक कोने के बाहर छिपा लेते हैं और अजीबोगरीब आवाजें निकालकर उस गोपी का ध्यान आकर्षित करते हैं। वह जल्दी से बिस्तर से उठती है और दरवाजे पर चोरी-छिपे जाती है, सावधान रहती है कि वह अपनी सास जैसे परिवार के सदस्यों को न जगाए। और बाहर वह कृष्ण से मिलती है और उन्हें आलिंगन और चुंबनों से प्रसन्न करती है। दिन में भी, कभी-कभी कृष्ण यमुना के तट पर गुप्त बैठक के लिए चुने हुए उपवन में व्यस्त होते हैं। पत्तियों और फूलों से एक मुलायम बिस्तर की व्यवस्था करते समय, वे गिरती पत्तियों की आवाज़ सुनते हैं, यह संकेत देते हुए कि उनकी प्रेयसी आ गई है। वह उपवन के बाहर पथ की ओर अपना चेहरा घुमाते हैं, जहाँ एक गोपी, यमुना से पानी लाने के बहाने, उनकी इच्छाओं को पूरा करने आ रही है। कभी-कभी सांझ ढले कई गोपियाँ कृष्ण की बाँसुरी की धुन से मंत्रमुग्ध हो जाती हैं। वे जल्दी-जल्दी उनकी ओर दौड़ती हैं, उनके वस्त्र, बाल और आभूषण अस्त-व्यस्त होते हैं। लेकिन जब वे उनसे मिलती हैं, तो वह उन्हें गर्वित, भ्रामक शब्दों से वापस मोड़ने की कोशिश करते हैं जो उन्हें निराशा में डाल देते हैं। जब वे असहाय होकर उनसे अपना विचार बदलने के लिए विनती करती हैं, तो वह सहमति देते हैं, अपना दिखावा छोड़ते हैं। और जब उन्हें पता चलता है कि वह सिर्फ उनके साथ मजाक कर रहे थे, तो वे खुशी से भर जाती हैं, उनकी पीली धोती के सिरे को पकड़ती हैं और उन्हें एक पास के एकांत उपवन में खींच ले जाती हैं।
इस तरह व्रज की गोपियाँ कृष्ण की अपने परम प्रेमी के रूप में पूजा करने की स्वतंत्रता का आनंद लेती हैं, जबकि द्वारका की रानियाँ स्वीकार करती हैं कि वे वैदिक आज्ञाओं और सामाजिक रीति-रिवाजों के अधीन धार्मिक गृहस्थ जीवन के सिद्धांतों के अनुसार ही उनकी पूजा करने तक ही सीमित हैं। इसलिए, रानियाँ घोषणा करती हैं, रानियों को कभी भी गोपियों से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, क्योंकि किसी अधीनस्थ को कभी भी श्रेष्ठ से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। उदाहरण के लिए, एक कुलीन घर की दासी को उस मालकिन से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए जिसकी वे सेवा करती हैं।
व्रज की गोपियों से ईर्ष्या करने के बजाय, द्वारका में कृष्ण की पत्नियाँ उन्हें भक्ति के पूर्ण उदाहरण के रूप में प्रशंसा करती हैं। गोपियों के लिए कृष्ण का प्रेम जानबूझकर सभी को उनके पारलौकिक व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता दिखाता है—अपने सबसे प्रिय भक्तों के नियंत्रण में उनका स्वैच्छिक समर्पण। खुलकर बोलने की हिम्मत किए बिना, रानियाँ गोपियों की तरह बनने की आशा पालती हैं। रानियाँ अपनी भक्ति के मूल्य को कम करती हैं, सांसारिक धार्मिक और सामाजिक कर्तव्यों से जुड़ने के लिए खुद को दोषी ठहराती हैं, हालाँकि सच्चाई में रानियाँ किसी भी भौतिक आसक्ति से मुक्त हैं। भले ही रानियाँ अपने धार्मिक और सामाजिक दायित्वों से जुड़ी हुई हों, लेकिन यह कोई गलती नहीं है, बल्कि एक गुण है जो कृष्ण के लिए उनके विशेष प्रेम को बढ़ाता है। जब रानियाँ यहाँ रुक्मिणी की तरह बोलती हैं, तो वे गोपियों के दुर्लभ भाग्य के लिए अपनी प्रशंसा व्यक्त करने के लिए नैसर्गिक विनम्रता से ऐसा करती हैं।
