श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  1.7.65 
पुर्या बहिः-प्रयाणेन
गो-पालनम् अवेक्ष्य च
विस्मयं संशयं चाप्तो
जहास हृदि भावयन्
 
 
अनुवाद
कृष्ण को एहसास हुआ कि वह गाय चराने के लिए नगर से बाहर गए हैं, और यह जानकर वे आश्चर्य और संदेह से भर गए। यह सोचकर वे हँस पड़े।
 
Krishna realized that he had gone out of town to graze the cows, and was filled with surprise and suspicion. He laughed at the thought.
तात्पर्य
अब द्वारका के राजकुमार के रूप में स्वयं को जानते हुए, कृष्ण को इस तथ्य का पता लगाना था कि वह और बलराम ग्वाल-बालकों की तरह कपड़े पहने हुए थे और समुद्र के किनारे गायों को चराते रहे थे। वह सोच में पड़ गया कि वह ऐसा क्यों कर रहे हैं और क्या ये चीजें वास्तव में हो रही हैं या किसी प्रकार का भ्रम है। वह अपनी इस असमर्थता पर हँसे कि वह इसका पता नहीं लगा पा रहे और सामान्य चेतना से लंबे समय से दूर चले गए हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)