श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  1.7.63 
परितो मुहुर् आलोक्य
श्रीमद्-द्वारवतीश्वरम्
श्री-यादवेन्द्रम् आत्मानं
प्रत्यभिज्ञातवांस् तदा
 
 
अनुवाद
पुनः चारों ओर देखते हुए, कृष्ण को स्मरण हुआ कि वे श्री द्वारका के स्वामी, यादवों के दिव्य राजा थे।
 
Looking around again, Krishna remembered that he was the lord of Sri Dwaraka, the divine king of the Yadavas.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)