श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  1.7.55 
इत्य् एवं स-चमत्कारं
मुहुर् जल्पन् महार्णवम्
पुरीं चालोचयन् प्रोक्तः
श्रीमत्-सङ्कर्षणेन सः
 
 
अनुवाद
विशाल सागर और नगरी को निहारते हुए वे विस्मित होकर बार-बार यही शब्द दोहरा रहे थे। तब भगवान बलराम ने उन्हें कुछ बताया।
 
Gazing at the vast ocean and the city, he was amazed and kept repeating these words over and over. Then Lord Balarama told him something.
तात्पर्य
कृष्ण को फैसला करने में संकोच हो रहा था कि वह जो देख रहे थे वह असली था या नहीं। उनके बड़े भाई को उनके लिए प्रश्न का निपटारा करना पड़ा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)