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श्री बृहत् भागवतामृत
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खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार
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अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)
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श्लोक 44
श्लोक
1.7.44
अस्तु तावद् इदानीं तद्
गम्यते त्वरया वने
सन्तोष-दे प्रदोषे ’द्य
मया त्वं मोदयिष्यसे
अनुवाद
खैर, अभी तो मुझे वन जाना है। आज संध्या के समय, हे तृप्तिदाता, आप मेरे साथ भोग करोगे।
Anyway, I must now return to the forest. This evening, O giver of satisfaction, you will enjoy me with pleasure.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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