श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  1.7.3-4 
तम् अपूर्व-दशा-भाजं
प्रेष्ठ-प्रणय-कातरम्
निगूढ-निज-माहात्म्य-
भर-प्रकटनोद्धतम्

महा-नारायणं ब्रह्मा
पितरं गुरुम् आत्मनः
स-चमत्कारम् आलोक्य
ध्वस्त-धैर्यो ’रुदत् क्षणम्
 
 
अनुवाद
ब्रह्मा ने अपने पिता और गुरु, आदि नारायण को, अपने प्रिय भक्तों के प्रेम से व्याकुल, अभूतपूर्व अवस्था में पाया। भगवान को इस प्रकार निर्भीकता से अपनी वास्तविक महानता, जो सामान्यतः गुप्त रहती है, प्रकट करते देख ब्रह्मा आश्चर्यचकित हो गए। एक क्षण के लिए उनका भी ध्यान भंग हो गया और वे रोने लगे।
 
Brahma found his father and guru, Adi Narayana, in an unprecedented state, overwhelmed with the love of his beloved devotees. Seeing the Lord so boldly revealing his true greatness, which is usually kept hidden, Brahma was astonished. For a moment, his meditation was broken and he began to weep.
तात्पर्य
ब्रह्मा न केवल सार्वभौमिक सृष्टि के मुख्य अभियंता हैं, बल्कि परम भगवान के एक अंतरंग प्रेमी सेवक भी हैं, और वे परम भगवान स्वयं न केवल सृष्टि के परम उत्पत्ति हैं, बल्कि अपने भक्तों के सबसे महान प्रेमी सेवक भी हैं। कृष्ण की सर्वोच्च महिमा भौतिक संसार के निर्माण के उनके मनोरंजन में नहीं पाई जानी चाहिए, ताकि विद्रोही आत्माएँ अपने विकृत इरादों को पूरा कर सकें।

इससे पहले कृष्ण के मनोरंजन में, ब्रह्मा ने व्रज-भूमि का दौरा किया था और कृष्ण और उनके शुद्ध भक्तों के बीच की अद्भुतीय रिश्तों में कृष्ण के सच्चे गौरव की खोज की थी। अब, द्वारका में, ब्रह्मा को और अधिक बोध दिया जा रहा है: वह सीख रहा है कि कृष्ण के सबसे अद्भुत गुण अपने भक्तों के लिए उनकी चिंता और उनके नियंत्रण के लिए उनका समर्पण है। इसे महसूस करते हुए, ब्रह्मा अब कृष्ण की पहचान को मूल परम भगवान, नारायण के रूप में और अधिक पूरी तरह से समझ सकते हैं। ब्रह्मा पहले इन मामलों से अनजान नहीं थे, लेकिन एक असहाय अवस्था में अपने स्वयं के पूर्वजों को देखकर, जिन्होंने उन्हें वेद पढ़ाए थे, ब्रह्मा को एक गहन एहसास हुआ। जब ब्रह्मा ने कृष्ण को संकट में देखा, तो वह स्वयं मदद नहीं कर सके, लेकिन रो पड़े।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)