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श्री बृहत् भागवतामृत
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खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार
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अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)
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श्लोक 156
श्लोक
1.7.156
गोपीनां महिमा कश्चित्
तासाम् एको ’पि शक्यते
न मया स्व-मुखे कर्तुं
मेरुर् मक्षिकया यथा
अनुवाद
मैं गोपियों की एक भी महिमा का वर्णन अपने शब्दों से नहीं कर सकता, जैसे कि मच्छर मेरु पर्वत को निगल नहीं सकता।
I cannot describe even one glory of the Gopis with my words, just as a mosquito cannot swallow Mount Meru.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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