नारदजी ने सोचा कि उन्होंने कोई अपराध किया है, इसलिए वे देवताओं और यादवों के साथ नहीं गए। वरन् वे बड़ी उत्सुकता से आकाश के बीच में छिप गए और भगवान के कार्यों की मधुरता का अवलोकन करने के लिए योगासन में बैठ गए।
Narada, feeling guilty, did not go with the gods and Yadavas. Instead, he eagerly hid himself in the middle of the sky and sat in yoga posture to observe the sweetness of the Lord's actions.
तात्पर्य
वास्तव में नारद ही थे, जिन्होंने श्रीकृष्ण को व्रजवासियों की वर्तमान स्थिति का उल्लेख कर इस प्रकार विचलित किया था। इसलिए नारद ने स्वयं को अपराधी माना। किन्तु वास्तव में उनका कोई अपराध नहीं था, जैसा कि यहाँ परीक्षित महाराज ईवा (जैसे) शब्द से बता रहे हैं। इस अध्याय में बाद में हम सुनेंगे कि श्रीकृष्ण व्याख्या करेंगे कि क्यों नारद को अपने आप को दोष नहीं देना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥