[नारद ने कहा:] श्री कृष्णचन्द्र, कृपया यह वरदान दें कि कोई भी व्यक्ति कभी भी यह अनुभव न करे कि उसे आपकी कृपा, आपकी भक्ति या परमानंद के भंडार आपके प्रति शुद्ध प्रेम की कमी हो गई है।
[Narada said:] Sri Krishnachandra, please grant this boon that no person may ever feel that he lacks Your grace, Your devotion or pure love for You, the reservoir of supreme bliss.
तात्पर्य
नारद चाहते हैं कि कृष्ण यह आश्वासन दें कि भक्त को कृष्ण की कृपा कितनी भी प्राप्त हो जाए भक्त कभी भी आत्म-संतुष्ट या आत्म-संतुष्ट नहीं होगा। बल्कि, वह हमेशा खुद को दया के अयोग्य समझेगा और उसे और अधिक की जरूरत होगी। नारद कृष्ण की दया, भक्ति-योग और प्रेम का उल्लेख करते हैं, तीनों एक साथ हैं, भले ही वे एक साथ नहीं बल्कि एक कारणात्मक अनुक्रम में प्रकट होते हैं: कृष्ण की दया भक्ति की ओर ले जाती है, जो प्रेम में विकसित होती है। नारद का तात्पर्य यह है कि भक्ति की प्रगति के विभिन्न स्तरों पर वैष्णवों की विभिन्न आवश्यकताएं होती हैं। भक्ति-योग की प्रक्रिया शुरू करने के लिए एक नौसिखिए को कृष्ण और उनके भक्तों से विशेष दया की आवश्यकता होती है; एक मध्यवर्ती साधक को अपने व्यक्तिगत भजन का अभ्यास करने के लिए पर्याप्त अवसरों की आवश्यकता होती है; और एक परिपक्व भक्त, अपनी प्रबल इच्छा से प्रेरित होकर, कृष्ण-प्रेम का स्वाद लेने की जरूरत है। निजीकरण अपने सैद्धांतिक आत्म-साक्षात्कार से संतुष्ट रहें। नारद और उनके अनुयायी कृष्ण के साथ अपने संबंधों की खोज के निरंतर बढ़ते आनंद से कभी नहीं थकते।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥