श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  1.7.127 
तच्-छोक-दुःखोपरमस्य पश्चाच्
चित्तं यतः पूर्णतया प्रसन्नम्
सम्प्राप्त-सम्भोग-महा-सुखेन
सम्पन्न-वत् तिष्ठति सर्वदैव
 
 
अनुवाद
निराशा की पीड़ा दूर हो जाने पर, व्यक्ति का हृदय पूर्णतया संतुष्ट हो जाता है, तथा वह निरंतर प्रसन्न रहता है, क्योंकि वह अपने प्रियतम से मिलने के महान सुख का आनन्द लेता है।
 
When the pain of disappointment is removed, the person's heart is completely satisfied, and he remains constantly happy, because he enjoys the great happiness of meeting his beloved.
तात्पर्य
जिन लोगों ने अभी तक कृष्ण के प्रति अपने नैसर्गिक आकर्षण को महसूस नहीं किया है, वे विरह के आनंद को नहीं समझ सकते। उन्हें व्यर्थ में उन चीजों में दक्ष होने का ढोंग नहीं करना चाहिए, जिनका उन तक कोई वास्तविक पहुंच नहीं है, बल्कि इसके बजाय वैष्णव परंपरा में प्रामाणिक रसिकों से मार्गदर्शन लेना चाहिए कि धीरे-धीरे भक्ति की पेचीदगियों को समझने के लिए कैसे उपयुक्त बनें। श्रद्धापूर्वक श्रवण और सेवा की आवश्यकता है।

फिर भी, भौतिक मन मांग कर रहा है, इसलिए नवोदित भक्त पूछ सकते हैं, "क्या अत्यधिक दुख सामान्य रूप से भ्रम या मृत्यु का कारण नहीं बनता है? असीमित आनंद दुख से क्यों उत्पन्न होना चाहिए? स्वीकार है कि प्रकृति के नियम बताते हैं कि आनंद के बाद आमतौर पर पीड़ा होती है और पीड़ा के बाद आनंद मिलता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पीड़ा शाब्दिक रूप से आनंद बन जाती है और इसके विपरीत; इसका मतलब है कि इस दुनिया में परिस्थितियां हमेशा बदल रही हैं, इसलिए न तो आनंद और न ही दुख लंबे समय तक दूसरे द्वारा प्रतिस्थापित किए बिना चल सकता है। यह कहना कि किसी प्रकार का दुख परम परमानंद में बदल जाता है, अनुचित है।"

तर्क द्वारा विरहा-भाव को सही ठहराने की ऐसी मांगों के जवाब में, शुद्ध भक्त व्यक्तिगत रूप से जो अनुभव करते हैं उसे निश्चित प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। शुद्ध भक्त वास्तव में विरह में आनंद का आनंद लेते हैं। और चूंकि इस परमानंद के लिए कोई अन्य कारण नहीं हो सकता, इसलिए इसका कारण उनकी तीव्र अनुभूति होना चाहिए जो बाहर से पीड़ा प्रतीत होती है।

विरहा-भाव को समझने के लिए भक्ति प्रक्रिया में नए लोगों की मदद करने के लिए, कृष्ण वर्तमान श्लोक बोलते हैं, विरहा-भाव के परमानंद की तुलना पीड़ा से राहत के आनंददायक सनसनी से करते हैं, एक राहत जिससे हर कोई परिचित है। एक व्यक्ति संतुष्टि के किसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर सकता है, और यद्यपि उसका संघर्ष दर्दनाक हो सकता है, जब वह अपने उद्देश्य को प्राप्त करता है तो दर्द खुशी में बदल जाता है। विरहा-भाव की परमानंदपूर्ण तकलीफ दर्द के बाद आने वाले आनंद के समान हो सकती है, लेकिन जैसा कि यहाँ "संपूर्ण-वत" ("अनुभव के रूप में") वाक्यांश द्वारा व्यक्त किया गया है, यह केवल बाहरी स्वरूप है। वास्तव में वियोग का आनंद अंतिम मिलन और अपने प्रिय के साथ आनंद लेने से नहीं आता है बल्कि स्वयं वियोग के "दर्द" से आता है। वह परमानंद पूर्ण संतुष्टि है, जिसमें व्यक्ति कभी भी कोई कमी महसूस नहीं करता है। उस परमानंद की तुलना अभाव के बाद संतुष्टि के आनंद से की जा सकती है, लेकिन वास्तव में यह बहुत अधिक उदात्त है। एक सामान्य व्यक्ति का मन तब राहत महसूस करता है जब वह उन लोगों से जुड़ सकता है जिन्हें वह प्यार करता है और फिर से अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करता है, लेकिन एक शुद्ध भक्त का सबसे बड़ा आनंद कृष्ण की सेवा और उन्हें विरह में याद करने से उत्पन्न होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)