श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  1.7.117 
एकः स मे तद्-व्रज-लोक-वत् प्रियस्
तादृङ्-महा-प्रेम-भर-प्रभावतः
वक्ष्यत्य् अदः किञ्चन बादरायणिर्
मज्-जीविते शिष्य-वरे स्व-सन्निभे
 
 
अनुवाद
केवल एक ही व्यक्ति, जो मुझे व्रज के भक्तों के समान ही प्रिय है, उन विषयों का वर्णन करने में समर्थ होगा - बादरायण व्यास के पुत्र शुकदेव। व्रजवासियों के भाव में अपने महान प्रेम के बल से, वे अपने उस श्रेष्ठ शिष्य से, जो आध्यात्मिक गुणों में उनके समान है और जिसे मैंने एक बार पुनर्जीवित किया था, उन विषयों के बारे में कुछ कहेंगे।
 
Only one person who is as dear to me as the devotees of Vraja will be able to describe those topics—Sukadeva, the son of Badarayana Vyasa. By virtue of his great love for the people of Vraja, he will speak about those topics to his excellent disciple, who is his equal in spiritual qualities and whom I once revived.
तात्पर्य
अगर किसी ने कृष्ण की वृन्दावन लीलाओं का वर्णन नहीं सुना, तो कैसे कृष्ण अपने अवतार का मुख्य उद्देश्य पूरा करेंगे, जो कि संसार में प्रेम-रस का पारलौकिक स्वाद फैलाना है? इस प्रश्न की प्रत्याशा करते हुए कृष्ण यहाँ इसका उत्तर देते हैं। श्री वृज-धाम के प्रेम-रस की महिमा तब प्रकट होगी जब शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को श्रीमद् भागवतं सुनाएंगे। क्योंकि शुकदेव की अपनी भक्ति संबंधी अनुभूतियाँ बिल्कुल व्रज-वासियों के उच्च मूड का अनुसरण करती हैं, उनके पास अपने होठों से निकलने वाली भागवतं कविता में वृज की महिमा व्यक्त करने की शक्ति है। शुकदेव भागवतं में कृष्ण-भक्ति-रस के अनंत महासागर की संक्षिप्त झलक भी प्रकट करेंगे, वह किसी भी इंसान को आध्यात्मिक रूप से ईमानदार होने पर शुद्ध भक्ति का अतिउत्तम स्वाद प्रदान करने के लिए पर्याप्त होगी।

शुकदेव श्रीमद्-भागवतं महाभारत के उस महान वैष्णव परीक्षित को सुनाएँगे जो कि सबसे उपयुक्त श्रोता है, जिसे कृष्ण ने गर्भ में ही जीवनदान दे दिया था। महाभारत के कथन के अनुसार, अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र हथियार ने वास्तव में उत्तर का गर्भस्थ शिशु मार दिया था, लेकिन कृष्ण ने उत्तर के गर्भ में प्रवेश किया और परीक्षित को नया शरीर दिया। और परीक्षित कृष्ण-जीवित बन गए, इस अर्थ में कि न केवल कृष्ण ने उन्हें जीवनदान दिया बल्कि इसलिए भी क्योंकि उनके जीवन का हर पल कृष्ण को याद करने में समर्पित था। वे अपने गुरु शुकदेव की तरह एक परिपूर्ण वैष्णव थे और इसलिए शुकदेव उनसे सबसे गोपनीय रहस्य कह सकते थे। सबसे योग्य वक्ता और सबसे योग्य श्रोता के संयुक्त प्रयासों से, श्रीमद्-भागवतं कलियुग के इस अंधेरे युग में भी अपनी अलौकिक रोशनी बिखेर सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)