श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 114
 
 
श्लोक  1.7.114 
अधुना तु स एवाहं
स्व-ज्ञातीन् यादवान् अपि
नेतुं नार्हामि तं भावं
नर्म-क्रीडा-कुतूहलैः
 
 
अनुवाद
परन्तु अब मैं अपने सम्बन्धियों यादवों में वही भावनाएँ नहीं जगा सकता, चाहे वे परिहास से हों या मनोरंजक लीलाओं से।
 
But now I cannot evoke the same feelings in my relatives, the Yadavas, either through jokes or entertaining pastimes.
तात्पर्य
व्रज के बाहर कृष्ण को जो चीज़ कमी खलती है, वह केवल वहाँ भोगा हुआ सुख नहीं है। इसके अलावा, व्रज के बाहर वे अपने भक्तों को संतुष्ट करने में स्वयं को कम सक्षम पाते हैं। द्वारका में वे अपनी पत्नियों, दोस्तों और सलाहकारों से घनिष्ठता से बातें करते हैं, उनसे मजाक करते हैं और उन्हें नाटकों और अन्य शगलों से खुश करते हैं, लेकिन व्रज के बाहर भावनाएँ कभी भी समान नहीं होती हैं। व्रज के बाहर उनके भक्त उनका सम्मान करते हैं, इसलिए उनके साथ व्यवहार में उन्हें अभिव्यक्ति की वही स्वतंत्रता कभी महसूस नहीं हो सकती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)