श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  1.7.110 
रूपेण वेषेण रवामृतेन
वंश्याश् च पूर्वानुदितेन विश्वम्
सम्मोहितं प्रेम-भरेण कृत्स्नं
तिष्ठन्तु दूरे व्रज-वासिनस् ते
 
 
अनुवाद
मेरा सुन्दर रूप, मेरा वस्त्र और मेरी अपूर्व अनसुनी बांसुरी की अमृतमय ध्वनि ने समस्त ब्रह्माण्ड को भगवान के अगाध प्रेम से मोहित कर लिया। तो फिर व्रजवासियों पर इनका क्या प्रभाव पड़ा, इसका तो कहना ही क्या।
 
My beautiful form, my attire, and the nectar-like sound of my unique and unheard flute captivated the entire universe with immense love for the Lord. What effect did they have on the people of Vraja? What can be said about them?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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