श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  1.7.102 
महा-दुष्ट-नृप-श्रेणि-
दर्पं संहरता मया
पाणिर् गृहीतः सङ्ग्रामे
हृत्वा राज्ञां प्रपश्यताम्
 
 
अनुवाद
इसलिए मैंने युद्ध में दुष्ट राजाओं के समूह के गर्व को नष्ट कर दिया, उसका हाथ पकड़ लिया, और सभी राजाओं के देखते-देखते उसे ले गया।
 
So I destroyed the pride of the group of wicked kings in battle, took hold of his hand, and carried him away in full view of all the kings.
तात्पर्य
जरसंध, शिशुपाल, रुक्मी और कृष्ण के अन्य प्रतिद्वंद्वी भाग्यशाली थे कि राजकुमारी रुक्मिणी के स्वयंवर में कृष्ण ने उनके अहंकार को कुचल दिया। रुक्मी और उनके मित्रों के सशस्त्र विरोध को आसानी से हराने के बाद, कृष्ण कुंडिना-पुरा से अपनी रथ पर रुक्मिणी को लेकर द्वारका गए, जहां उन्होंने उससे विवाह किया। कृष्ण ने यहां दावा किया कि उन्होंने वही किया जो उस समय की मांग थी और वह अपने दिल की खुशी का पीछा नहीं कर रहे थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)