श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  1.7.101 
मद्-अनाप्त्या तु रुक्मिण्या
वाञ्छन्त्याः प्राण-मोचनम्
श्रुत्वास्या विप्र-वदनाद्
आर्ति-विज्ञप्ति-पत्रिकाम्
 
 
अनुवाद
परन्तु एक ब्राह्मण के मुख से मैंने रुक्मिणी का पत्र सुना, जिसमें उसने अपनी व्यथा बताई थी तथा कहा था कि यदि वह मुझे प्राप्त न कर सकी तो वह आत्महत्या कर लेगी।
 
But from a Brahmin I heard Rukmini's letter in which she expressed her sorrow and said that if she could not get me, she would commit suicide.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd