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श्लोक 1.7.101  |
मद्-अनाप्त्या तु रुक्मिण्या
वाञ्छन्त्याः प्राण-मोचनम्
श्रुत्वास्या विप्र-वदनाद्
आर्ति-विज्ञप्ति-पत्रिकाम् |
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| अनुवाद |
| परन्तु एक ब्राह्मण के मुख से मैंने रुक्मिणी का पत्र सुना, जिसमें उसने अपनी व्यथा बताई थी तथा कहा था कि यदि वह मुझे प्राप्त न कर सकी तो वह आत्महत्या कर लेगी। |
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| But from a Brahmin I heard Rukmini's letter in which she expressed her sorrow and said that if she could not get me, she would commit suicide. |
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