भवतीनां वियोगो मे
ना हि सर्वत्मना क्वचित्
यथा भूतानि भूतेषु
खं वाय्व-अग्निर जलं मही
तथा चाham मनः-प्राणा-
बुद्धिंद्रिय-गुणाश्रयः
"तुम मुझसे वास्तव में कभी अलग नहीं हो, क्योंकि मैं सभी सृष्टि की आत्मा हूं। जैसे प्रकृति के तत्व- आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- हर रचित चीज़ में मौजूद हैं, वैसे ही मैं हर किसी के मन, प्राण-वायु, बुद्धि और इंद्रियों के साथ-साथ भौतिक तत्वों और प्रकृति के गुणों में भी मौजूद हूं।" (भागवतम 10.47.29) कृष्ण का यह संदेश व्रज-वासियों की उनके लौटने की आशा को चकनाचूर कर दिया।
