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श्लोक 1.6.83  |
तद् अस्मज्-जीवनं धिग् धिक्
तिष्ठेत् कण्ठे ’धुनापि यत्
नन्द-गोपांश् च धिग् धिग् ये
तं त्यक्त्वैतान्य् उपानयन् |
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| अनुवाद |
| "अतः, हमारे जीवन और हमारे कंठ में चल रही साँसों को धिक्कार है! और नन्द और ग्वालों को धिक्कार है! उन्हें ये सब छोड़कर स्वयं कृष्ण को लाना चाहिए था।" |
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| "So, shame on our lives and the very breath in our throats! And shame on Nanda and the cowherds! They should have left all this and brought Krishna themselves." |
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