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श्लोक 1.6.35  |
अयम् एव हि किं तेषु
त्वत्-प्रभोः परमो महान्
अनुग्रह-प्रसादो यस्
तात्पर्येणोच्यते त्वया |
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| अनुवाद |
| क्या यह तुम्हारे रब की उन पर सबसे बड़ी कृपा और दया है, जैसा कि तुम्हारे शब्दों से ज़ाहिर होता है? |
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| Is this the greatest grace and mercy of your Lord upon them, as is evident from your words? |
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